Date:- 19 July 2026
लेखक- करियर पाथ फाउंडेशन (Career Path Foundation)
आज हमारा समाज विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा है। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में उच्च शिक्षा में बेटियों का नामांकन 42% बढ़ा है. आज उच्च शिक्षा में जेंडर पैरिटी इंडेक्स (GPI) 1.08 है, यानी प्रति 100 लड़कों पर 108 लड़कियां कॉलेज पहुंच रही हैं। लेकिन इस चमकते आंकड़े के पीछे एक कड़वी हकीकत भी छिपी है।
हाल ही में समाज के विभिन्न कोनों से आई कुछ सच्ची कहानियां यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या वाकई हमारे पढ़े-लिखे अभिभावक मानसिक रूप से आज़ाद हो पाए हैं? संसद में दी गई रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 30 लाख किशोरियां पारिवारिक और सामाजिक कारणों से स्कूल-कॉलेज छोड़ देती हैं, जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश में शैक्षणिक वर्ष 2025-26 के दौरान 1 लाख ड्रॉपआउट्स में आधी से ज़्यादा लड़कियां थीं।
आखिर ऐसा क्यों है कि माता-पिता के योग्य होने के बावजूद बेटियों के पंख काट दिए जाते हैं? आइए समाज की इस गहरी बीमारी का विश्लेषण करें।
एक वास्तविक मामले में, एक लड़की जिसके पिता एलएलबी (वकालत) और मां बी.एड धारक हैं, उसे सिर्फ इसलिए आगे नहीं पढ़ने दिया गया क्योंकि माता-पिता को डर था कि बाहर (लखनऊ जैसे शहरों में) जाकर लड़की 'बिगड़' जाएगी। उसने सीयूईटी (CUET) परीक्षा तक छोड़ दी।
सोचने वाली बात: जब उच्च शिक्षित अभिभावक ही अपनी बेटियों के भविष्य के साथ ऐसा खिलवाड़ करेंगे, तो समाज में बदलाव कैसे आएगा?
एक अन्य मामले में, एक बेहद होनहार लड़की जिसका चयन थाईलैंड जाने के लिए हुआ था, उसके सगे भाई ने 'पारिवारिक जिम्मेदारी' और 'शक' के नाम पर उसका रास्ता रोक दिया। उसे लड़कों से बात न करने और घर में बैठने पर मजबूर किया गया। नतीजा यह हुआ कि घुटन में आकर लड़की जिद में और विद्रोह करने लगी।
यह साफ दर्शाता है कि अत्यधिक नियंत्रण सुरक्षा नहीं, बल्कि विद्रोह को जन्म देता है। माता-पिता या अभिभावक खुद को सर्वज्ञानी और बच्चों को अपनी 'गुलाम' समझने की भूल कर बैठते हैं, जो एक उम्र के बाद बच्चों को उनका विरोधी बना देता है।
भारत सरकार ने अनुसूचित जाति के होनहार छात्रों को देश के सबसे बेहतरीन आवासीय स्कूलों में 9वीं से 12वीं तक मुफ्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए 'श्रेष्ठा योजना' (SHRESHTA Scheme) शुरू की है।
ऐसी ही एक योजना के तहत एक प्रतिभावान लड़की ने 11वीं-12वीं की पढ़ाई बेहतरीन कॉलेज से पूरी की। लेकिन जब आगे की पढ़ाई की बारी आई, तो उसके गार्जियंस ने उसे यह कहकर रोक दिया कि "आगे जाकर लड़की हाथ से निकल जाएगी।" वित्तीय रूप से निर्भर होने के कारण वह लड़की आज बेबस है। सरकार अपनी तरफ से रास्ते खोल रही है, लेकिन हमारा रूढ़िवादी समाज उन रास्तों पर 'असुरक्षा और शक' के कांटे बो रहा है।
इन अंधेरी कहानियों के बीच एक उम्मीद की किरण भी है। एक ऐसे परिवार की लड़की, जिसकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, लेकिन उसके छोटे भाई ने उसकी फीस का जिम्मा उठाया। उस लड़की ने पूरी लगन से पढ़ाई की और आज वह ताइवान (Taiwan) में पोस्ट-ग्रेजुएशन कर रही है।
दिलचस्प बात यह है कि उसके माता-पिता को जब उसके किसी अफेयर के बारे में पता चला, तो उन्होंने रूढ़िवादी समाज की तरह उसे प्रताड़ित नहीं किया, बल्कि उसकी व्यक्तिगत पसंद का सम्मान किया। इस भरोसे का नतीजा यह हुआ कि वह आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने परिवार का नाम रोशन कर रही है।
एक उम्र के बाद हर बच्चे की अपनी इच्छाएं होती हैं। अभिभावकों को यह समझना होगा कि:
बच्चों को गाइड करें, उन पर अपनी इच्छाएं न थोपें।
ट्यूशन या कोचिंग भेजने के नाम पर बंदिशें लगाने से बच्चों का ही नहीं, बल्कि बेटों का भी भविष्य बर्बाद होता है (जैसा कि एक मामले में देखा गया जहां एक होनहार बेटे की पढ़ाई भी माता-पिता की इसी जिद के कारण छूट गई)।
समाज की फालतू बातों और गॉसिप्स के आधार पर अपने बच्चों के करियर का फैसला न लें।
बदलाव किसी और के घर से नहीं, हमारे अपने विचारों से शुरू होगा। बेटियों को नियंत्रण की बेड़ियों में रखने के बजाय, उन्हें भरोसे के पंख दीजिए, ताकि वे आसमान छू सकें।
निष्कर्ष: 'करियर पाथ फाउंडेशन' की एक सराहनीय पहल
आज के दौर में जहां ग्रामीण अंचलों में कई होनहार बच्चे सही मार्गदर्शन के अभाव में पीछे छूट जाते हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में करियर पाथ फाउंडेशन (Career Path Foundation) एक नई उम्मीद बनकर उभरा है. यह फाउंडेशन विशेष रूप से गांव-देहात के उन बच्चों की मदद के लिए प्रयासरत है, जिन्हें करियर सहायता प्राप्त करने में गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.
ग्रामीण समाज के लड़के और लड़कियों को भटकाव से बचाकर सही राह दिखाने में करियर पाथ फाउंडेशन अत्यंत सराहनीय भूमिका निभा रहा है. आज के समय में जब रूढ़िवादी सोच और अति-नियंत्रण के कारण बच्चों का भविष्य प्रभावित हो रहा है, तब इस प्रकार के प्रयासों की समाज को अति-आवश्यकता है. यह संस्था न केवल बच्चों का मार्गदर्शन कर रही है, बल्कि गार्जियंस (अभिभावकों) को भी काउंसिलिंग के जरिए समझाने और उनकी मानसिकता में सकारात्मक बदलाव लाने में मदद कर रही है.
उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों से सीधी ज़मीनी शुरुआत करने वाला करियर पाथ फाउंडेशन वाकई ग्रामीण युवाओं के सपनों को नई उड़ान दे रहा है.
Ministry of Education. (2024). All India Survey on Higher Education (AISHE) 2021-2022. Department of Higher Education, Government of India. https://www.education.gov.in/
Ministry of Education. (2025). Drop-out rates of girls in rural areas: Lok Sabha unstarred question no. 1240. Government of India. https://sansad.in/ls
Ministry of Social Justice and Empowerment. (2023). Scheme for Residential Education for Students in High Schools in Targeted Areas (SHRESHTA). Government of India. https://socialjustice.gov.in/
डिग्रियों की गठरी और चूल्हे का धुआं: भारतीय महिलाओं द्वारा जीवन में झेले गए संघर्ष, पीड़ा और त्याग पर आधारित कहानी
Date:- 13 July 2026
लेखक- करियर पाथ फाउंडेशन (Career Path Foundation)
कमरे के एक कोने में रखी वो पुरानी ट्रंक आज भी जब खुलती है, तो उसमें से फिनाइल की गोलियों और पुरानी किताबों की एक मिली-जुली महक आती है। उस ट्रंक की सबसे निचली सतह पर एक लाल मखमली फाइल दबी पड़ी है। उस फाइल में एम.ए. और बीएड की डिग्रियां बड़े सलीके से रखी हैं, जिन पर सोने के पानी से ‘प्रथम श्रेणी’ लिखा हुआ है।
यह डिग्रियां किसी म्यूजियम की धरोहर जैसी लगती हैं—सुरक्षित, चमकीली, लेकिन मौजूदा जिंदगी में पूरी तरह बेअसर। यह फाइल 32 साल की पल्लवी की है।
सुबह के ठीक 5 बजे हैं। उत्तर प्रदेश के एक अर्ध-शहरी इलाके के एक घर में पल्लवी की आंखें खुलती हैं। अलार्म बजने से पहले ही उसका शरीर जाग जाता है। रसोई में जाकर चाय का बर्तन चढ़ाना, ससुर जी के लिए बिना चीनी की चाय छानना, पति के लिए टिफिन पैक करना और बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना—यह उसकी रोज की तयशुदा ‘शिफ्ट’ है।
पल्लवी की सास, जो खुद कभी स्कूल नहीं गईं, अक्सर मोहल्ले की औरतों से कहती हैं, "हमारी बहू बहुत पढ़ी-लिखी है। बड़े कॉलेज से पास आउट है।" सास की आवाज में गर्व होता है, लेकिन पल्लवी के सीने में एक अजीब सी टीस उठती है। पढ़ी-लिखी तो वो है, लेकिन उसकी इस पढ़ाई का इस्तेमाल सिर्फ बच्चों का होमवर्क कराने और राशन का हिसाब जोड़ने में होता है।
एक दिन, जब उसकी सहेली नेहा (जो दिल्ली में एक एनजीओ में काम करती है) ने उससे फोन पर पूछा, "यार पल्लवी, तूने गोल्ड मेडल जीता था। तू नौकरी क्यों नहीं करती? क्यों घर में बैठ गई?"
पल्लवी ने खिड़की के बाहर उड़ती हुई धूल को देखा और धीमी आवाज में कहा, "नौकरी मैं नहीं छोड़ना चाहती थी नेहा, नौकरी ने मुझे छोड़ दिया... या शायद इस व्यवस्था ने।"
पल्लवी की कहानी कोई अकेली कहानी नहीं है। यह भारत की उन करोड़ों बेटियों का सच है जो पढ़-लिख तो रही हैं, लेकिन श्रम बाजार (Labour Market) से गायब हैं।
यदि हम सरकारी आंकड़ों के आईने में इस दर्द को देखें, तो सच और भी भयानक नजर आता है:
पीएलएफएस (PLFS 2025-26) का कड़वा सच: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में महिला श्रम बल भागीदारी (LFPR) में हाल के वर्षों में कुछ सुधार हुआ है और यह लगभग 37% के आसपास पहुंची है। लेकिन जब इस आंकड़े की परतें खोली जाती हैं, तो असलियत सामने आती है। इस बढ़ी हुई भागीदारी का एक बड़ा हिस्सा 'अवैतनिक पारिवारिक श्रम' (Unpaid Family Labour) है, यानी महिलाएं अपने घरों के खेतों या पारिवारिक व्यवसायों में हाथ तो बंटा रही हैं, लेकिन उन्हें इसके बदले कोई सैलरी नहीं मिलती।
पढ़ी-लिखी महिलाएं और बेरोजगारी की मार: एनएसएसओ (NSSO) और पीएलएफएस के ऐतिहासिक रुझान दिखाते हैं कि जैसे-जैसे महिलाओं की शिक्षा का स्तर बढ़ता है, विडंबना यह है कि शुरुआती स्तर पर उनकी बेरोजगारी दर भी बढ़ जाती है। अनपढ़ महिलाएं मजबूरी में कोई भी कम वेतन वाला शारीरिक श्रम करने को तैयार हो जाती हैं, लेकिन उच्च शिक्षित महिलाएं (जैसे पल्लवी) सामाजिक प्रतिष्ठा और सुरक्षा के कारण हर कोई काम नहीं कर सकतीं। उपयुक्त नौकरियों की कमी उन्हें घर बैठने पर मजबूर कर देती है।
वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति: 'विश्व बैंक' (World Bank) और 'अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन' (ILO) की रिपोर्टों के अनुसार, भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर दुनिया के कई विकासशील देशों और यहां तक कि हमारे पड़ोसी देशों (जैसे बांग्लादेश) से भी कम रही है। इसे अर्थशास्त्र में "U-Shaped Curve" कहा जाता है—यानी जब समाज बहुत गरीब होता है, तो औरतें मजबूरी में काम करती हैं। जब थोड़ी समृद्धि आती है और शिक्षा बढ़ती है, तो परिवार अपनी प्रतिष्ठा के लिए औरतों को काम से हटा लेते हैं।
पल्लवी के मायके में उसकी चचेरी बहन, ऊषा रहती है। ऊषा ने सिर्फ 8वीं तक पढ़ाई की है। वह सुबह से शाम तक खेतों में धान रोपती है, गेहूं काटती है और मवेशियों को संभालती है।
डेटा भी इसी तरफ इशारा करता है। भारत में कृषि का "महिलाकरण" (Feminization of Agriculture) हो रहा है। पुरुष रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं, और ग्रामीण इलाकों में खेती का पूरा बोझ महिलाओं के कंधों पर आ गया है।
एनएसएसओ और सरकारी रिपोर्टों के अनुसार: ग्रामीण भारत में काम करने वाली महिलाओं का करीब 70-80% हिस्सा आज भी कृषि और उससे जुड़े कामों में लगा हुआ है। लेकिन त्रासदी देखिए—खेतों में हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद भी वे 'किसान' नहीं कहलातीं। जमीन के पट्टे पुरुषों के नाम होते हैं, और महिलाओं को सिर्फ 'मजदूर' या 'पारिवारिक सहायक' माना जाता है।
जब पल्लवी ऊषा को देखती है, तो सोचती है—"वह अनपढ़ होकर भी खेतों में पसीना बहा रही है, और मैं इतनी डिग्रियां लेकर भी चारदीवारी में बंद हूं। हम दोनों में से आजाद कौन है?"
पल्लवी ने एम.ए. करने के बाद एक बार शहर के एक कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए इंटरव्यू दिया था। उसका चयन भी हो गया था। लेकिन नौकरी की जगह घर से 40 किलोमीटर दूर थी।
शाम को जब उसने घर पर यह बात बताई, तो ससुर जी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, "बहू, इतनी दूर जाओगी तो बच्चों को कौन संभालेगा? घर का खाना कौन बनाएगा? हमारे घर में पैसों की कमी तो नहीं है। नौकरी शौक के लिए करनी हो, तो पास में देख लो।"
पति ने भी कहा, "वहां से लौटते हुए तुम्हें रात के 7 बज जाएंगे। आज का माहौल ठीक नहीं है। रहने दो।"
यह वह मोड़ है जहां एनएफएचएस-5 (NFHS-5: National Family Health Survey) के आंकड़े पल्लवी के आंसुओं को शब्दों में बयां करते हैं:
घरेलू काम का एकतरफा बोझ: एनएफएचएस और 'टाइम यूज सर्वे' (Time Use Survey) के मुताबिक, भारतीय महिलाएं पुरुषों की तुलना में औसतन 8 गुना ज्यादा समय अवैतनिक देखभाल (Unpaid Care Work) और घरेलू कामों में बिताती हैं।
निर्णय लेने की आजादी की कमी: एनएफएचएस के आंकड़े साफ दिखाते हैं कि आज भी लाखों विवाहित महिलाओं को अपने स्वास्थ्य, बड़े घरेलू खर्चों और यहां तक कि अपने मायके जाने के लिए भी खुद फैसला लेने की पूरी आजादी नहीं है। जब बुनियादी फैसलों में इतनी निर्भरता हो, तो करियर का फैसला महिला अकेले कैसे ले सकती है?
सुरक्षा और परिवहन का अभाव: शहरों और कस्बों में सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन (Safe Public Transport) की कमी और कार्यस्थलों पर सुरक्षा की चिंता महिलाओं को घर से बाहर निकलने से रोकती है।
साल बीतते गए। पल्लवी की डिग्रियां अलमारी में बंद रहीं। एक दिन उसकी 8 साल की बेटी अनन्या अपनी स्कूल की किताब लेकर आई। किताब में एक चैप्टर था—"Our Helpers"। उसमें डॉक्टर, इंजीनियर और पायलट की तस्वीरें बनी थीं और सभी तस्वीरों में पुरुष बने हुए थे, जबकि शिक्षिका और नर्स की तस्वीर में महिलाएं थीं।
अनन्या ने पूछा, "मम्मी, आप तो इतनी बड़ी क्लास तक पढ़ी हो, फिर आप डॉक्टर या ऑफिसर क्यों नहीं बनी? आप सिर्फ खाना क्यों बनाती हो?"
पल्लवी के पास इस मासूम सवाल का कोई जवाब नहीं था। उसकी आंखों से एक आंसू टपका और सीधे अनन्या की किताब पर जा गिरा। उसने अपनी बेटी को गले से लगा लिया और मन ही मन सोचा—"मैं तुम्हें सिर्फ पढ़ाऊंगी नहीं अनन्या, मैं तुम्हें उस पिंजरे से लड़ना भी सिखाऊंगी, जिसमें तुम्हारी मां अपनी डिग्रियों के साथ कैद है।"
पल्लवी, ऊषा और नेहा... यह तीन अलग-अलग किरदार नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय समाज के तीन चेहरे हैं।
जब तक हम जीडीपी (GDP) और विकास के बड़े-बड़े दावे करते रहेंगे, तब तक यह सच नहीं बदलेगा कि देश की आधी आबादी को हमने चूल्हे के धुएं और खेतों की पगडंडियों के बीच सीमित कर रखा है। पढ़ी-लिखी औरतों का नौकरी के पीछे न भागना उनकी 'मर्जी' नहीं, बल्कि एक 'मौन सामाजिक समझौता' है, जहां औरत को अपनी महत्वाकांक्षाओं की आहुति देकर ही 'पारिवारिक शांति' मिलती है।
सरकारें स्कीमें ला सकती हैं, डेटा ग्राफ बदल सकते हैं, लेकिन जब तक पुरुषों की मानसिकता में घरेलू कामों की साझेदारी नहीं आएगी और जब तक समाज एक कामकाजी महिला को 'घरेलू जिम्मेदारियों से मुक्त' होकर काम करने का माहौल नहीं देगा, तब तक लाल मखमली फाइलों में बंद डिग्रियां यूं ही सिसकती रहेंगी।
इसी खामोश दर्द और सामाजिक बेड़ियों को बदलने के लिए, उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार सीतापुर की जमीनी हकीकत के बीच 'करियर पाथ फाउंडेशन' लगातार काम कर रहा है; यह संस्था ग्रामीण और कस्बाई लड़कियों के भीतर न सिर्फ बेहतरीन स्किल्स (कौशल) विकसित करने की पुरज़ोर कोशिश कर रही है ताकि वे इन चारदीवारियों को तोड़कर बाहर काम की तलाश में निकल सकें, बल्कि उन्हें पारंपरिक ढर्रों से अलग नए और अपरंपरागत करियर ऑप्शन्स की राह दिखाकर आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक नई क्रांति की शुरुआत कर रही है।
Date:- 30 June 2026
करियर पाथ फाउंडेशन (Career Path Foundation) की एक विशेष रिपोर्ट
आज के समय में इंटरनेट और स्मार्टफोन की वजह से पढ़ाई-लिखाई हर किसी की पहुँच में आ गई है। यूट्यूब और मोबाइल ऐप्स पर दुनिया की सबसे अच्छी पढ़ाई से जुड़ी चीजें मुफ्त या बहुत कम पैसों में मिल जाती हैं। इसके बाद भी, गाँवों और दूरदराज के इलाकों में बच्चों के सीखने के स्तर में कोई बड़ा सुधार नहीं देखा गया है।
यह स्थिति एक बड़ा सवाल खड़ा करती है: जब मोबाइल में पढ़ाई का सारा सामान मौजूद है, तो बच्चे असलियत में सीख क्यों नहीं पा रहे हैं? करियर पाथ फाउंडेशन ने जमीनी हकीकत को समझकर इसके पीछे के 4 बड़े कारणों का पता लगाया है:
सबसे मुख्य बात: पढ़ाई का नियम है कि “सिर्फ मोबाइल में वीडियो आ जाने से कोई सीख नहीं जाता।” मोबाइल और इंटरनेट सिर्फ एक जरिया हैं, पूरी पढ़ाई नहीं।
इंटरनेट पर ज्यादातर पढ़ाई सिर्फ एकतरफा होती है, जहाँ बच्चा सिर्फ स्क्रीन पर चल रहे वीडियो को देखता रहता है।
सामने समझाने वाले गुरुजी का न होना: एक रिकॉर्ड किया हुआ वीडियो कभी भी बच्चे की आँखों को देखकर यह नहीं समझ सकता कि उसे कहाँ समझ नहीं आया। गाँव के ऐसे बच्चे, जिनके माता-पिता कभी स्कूल नहीं गए, उन्हें समझाने के लिए सामने एक ऐसे मददगार की जरूरत होती है जो उनकी स्थानीय भाषा में आसान उदाहरण दे सके।
कोई पूछने वाला नहीं होता: स्कूल या ट्यूशन के माहौल के बिना खुद से पढ़ना बहुत मुश्किल होता है। जब बच्चों के पास तुरंत अपनी शंका (सवाल) पूछने का कोई जरिया नहीं होता, तो वे वीडियो तो देख लेते हैं, पर उनके दिमाग में बात बैठती नहीं है।
भले ही आज गाँवों में मोबाइल फोन पहुँच गए हैं, लेकिन पढ़ाई के लिए जितने समय और ध्यान की जरूरत होती है, वह बच्चों को नहीं मिल पाता।
एक मोबाइल और पढ़ने वाले कई बच्चे: गाँवों में ज्यादातर परिवारों के पास केवल एक ही स्मार्टफोन होता है, जो आमतौर पर घर के कमाने वाले सदस्य (पिता या बड़े भाई) के पास रहता है। बच्चों को यह मोबाइल सिर्फ देर शाम को 1 या 2 घंटे के लिए मिलता है, जिसे उन्हें अपने भाई-बहनों के साथ बांटना पड़ता है।
बार-बार ध्यान भटकना: गाँव में नेटवर्क का बार-बार चले जाना, बिजली कटना और वीडियो के बीच-बीच में आने वाले विज्ञापन बच्चों के ध्यान को पूरी तरह तोड़ देते हैं। गणित और विज्ञान जैसे कठिन विषयों को समझने के लिए जिस लगातार एकाग्रता (focussed mind) की जरूरत होती है, वह इन दिक्कतों के कारण नहीं मिल पाती।
इंटरनेट पर मौजूद ज्यादातर अच्छे वीडियो शहरों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं, जो गाँव के बच्चों के अनुभव से बिल्कुल अलग होते हैं।
अजनबी उदाहरण: अगर कोई वीडियो गणित समझाने के लिए 'मेट्रो ट्रेन', 'पिज़्ज़ा' या 'शॉपिंग मॉल' का उदाहरण देता है, तो गाँव का बच्चा पहले यह सोचने में समय गंवा देता है कि ये चीजें कैसी होती हैं। इस चक्कर में वह असली विषय (जैसे गणित का फॉर्मूला) सीख ही नहीं पाता।
ढेर सारे वीडियो में भटकाव: इंटरनेट पर वीडियो का समंदर है। बिना किसी सही गाइडेंस या सिलेबस के बच्चे भटक जाते हैं। वे एक के बाद एक अलग-अलग वीडियो देखते हैं, जिससे कोई पक्की पढ़ाई नहीं हो पाती।
अच्छी पढ़ाई के लिए घर पर एक शांत और सही माहौल का होना बहुत जरूरी है, जो अक्सर गाँवों में नहीं मिल पाता।
घर के काम और जिम्मेदारी: गाँव में बच्चे स्कूल या पढ़ाई के बाद खेती के काम, मवेशियों (गाय-भैंस) की देखभाल या घर के कामों में लग जाते हैं। दिनभर की शारीरिक मेहनत के बाद शाम को भारी-भरकम पढ़ाई के लिए उनके पास ताकत ही नहीं बचती।
घर पर मदद न मिल पाना: गाँव के माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाना तो चाहते हैं, लेकिन उनमें से कई खुद मोबाइल चलाना या पढ़ना-लिखना नहीं जानते। इसलिए वे फोन में आने वाली गड़बड़ियों को ठीक करने या सही वीडियो चुनने में बच्चे की मदद नहीं कर पाते।
इस समस्या का हल सिर्फ और ज्यादा वीडियो डालना या मुफ्त इंटरनेट बांटना नहीं है। अगर हमें गाँव के बच्चों को आगे बढ़ाना है, तो हमें किताब और मोबाइल दोनों को मिलाकर एक नया रास्ता निकालना होगा:
गाँव के पढ़े-लिखे युवाओं को जोड़ना: तकनीक कभी भी शिक्षक की जगह नहीं ले सकती। हमें गाँवों के ही पढ़े-लिखे युवाओं को ट्रेनिंग देनी होगी, जो मोबाइल के वीडियो को बच्चों के सामने बैठकर आसान भाषा में समझा सकें।
बिना इंटरनेट चलने वाले ऐप्स: ऐसे मोबाइल ऐप्स और सॉफ्टवेयर बनाए जाएं जो बिना इंटरनेट और बिना विज्ञापनों के भी चल सकें। साथ ही, उनमें गाँव के माहौल (जैसे खेती-किसानी, स्थानीय खेल और हाट-बाजार) से जुड़े उदाहरण हों।
गाँव में पढ़ाई केंद्र (Community Study Centers): हर गाँव में एक ऐसी साझा जगह (सेंटर) बनाई जाए जहाँ बिजली, इंटरनेट और शांत माहौल हो, ताकि बच्चे घर के कामों से अलग होकर कुछ देर शांति से पढ़ सकें।
यह लेख करियर पाथ फाउंडेशन के 'ग्रामीण शिक्षा सुधार कार्यक्रम' के तहत लिखा गया है।
ग्रामीण भारत में अंग्रेजी भाषा का अभाव: शैक्षिक सशक्तिकरण में बढ़ती खाई और समाधान
दिनांक: 27 जून, 2026
वैश्वीकरण (Globalization) और डिजिटल क्रांति के इस दौर में, अंग्रेजी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि वैश्विक ज्ञान, उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों की एक आवश्यक कुंजी बन चुकी है। हालांकि, भारत के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच डिजिटल डिवाइड के साथ-साथ एक गहरा भाषा संबंधी अंतराल (Linguistic Divide) भी मौजूद है। ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों, विशेषकर बालिकाओं के लिए अंग्रेजी भाषा के ज्ञान में कमी (Deficit in English Language Knowledge) उनके शैक्षिक सशक्तिकरण और सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा बन रही है।
ग्रामीण भारत में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम मुख्यतः क्षेत्रीय भाषाएँ होती हैं। इसके विपरीत, उच्च शिक्षा (जैसे- चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधन और सार्वजनिक नीति) और पेशेवर तकनीकी पाठ्यक्रमों में अध्ययन सामग्री और निर्देश मुख्य रूप से अंग्रेजी में उपलब्ध होते हैं।
शिक्षा मंत्रालय के अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (AISHE 2021-22) के अनुसार, उच्च शिक्षा में ग्रामीण और वंचित समुदायों के नामांकन में वृद्धि तो हुई है, लेकिन तकनीकी और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में उनकी हिस्सेदारी शहरी छात्रों की तुलना में काफी कम है (Ministry of Education, 2024)। इसका एक प्रमुख कारण अंग्रेजी भाषा की समझ का कमजोर होना है, जिसके चलते ग्रामीण छात्र प्रवेश परीक्षाओं और साक्षात्कारों (Interviews) में पिछड़ जाते हैं।
इसके अतिरिक्त, असर (ASER - Annual Status of Education Report 2023) की 'बियॉन्ड बेसिक्स' रिपोर्ट दर्शाती है कि 14 से 18 वर्ष के आयु वर्ग के लगभग 42.7% ग्रामीण बच्चे अंग्रेजी का एक सरल वाक्य भी ठीक से नहीं पढ़ सकते हैं (Pratham Education Foundation, 2024)। यह भाषाई कमी ग्रामीण छात्रों को वैश्विक ज्ञान तंत्र से दूर कर देती है, जिससे एक बड़ा 'एजुकेशनल गैप' पैदा होता है।
योग्य शिक्षकों का अभाव (Lack of Qualified Teachers): ग्रामीण स्कूलों में अंग्रेजी विषय के प्रशिक्षित और विषय-विशेषज्ञ शिक्षकों की भारी कमी है। अधिकांश मामलों में, सामान्य शिक्षक ही अंग्रेजी पढ़ाते हैं, जिनकी स्वयं की भाषाई दक्षता सीमित होती है।
अवसंरचना और संसाधनों की कमी (Resource Crunch): ग्रामीण सरकारी स्कूलों में आधुनिक शिक्षण सहायक सामग्री (जैसे- लैंग्वेज लैब, अंग्रेजी कहानियां, और ऑडियो-विजुअल टूल्स) की अनुपलब्धता एक बड़ा कारण है।
व्यावहारिक वातावरण का न होना (Lack of Exposure): ग्रामीण परिवेश में घरेलू और सामाजिक स्तर पर अंग्रेजी बोलने या सुनने का कोई माहौल नहीं होता है, जिससे छात्रों का आत्मविश्वास नहीं बढ़ पाता।
लैंगिक असमानता (Gender Disparity): ग्रामीण क्षेत्रों में बालिकाओं को अक्सर स्थानीय सरकारी स्कूलों में भेजा जाता है, जबकि लड़कों को निजी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेजने की प्रवृत्ति पाई जाती है। इसके कारण ग्रामीण बालिकाओं को दोहरी मार झेलनी पड़ती है—एक तो ग्रामीण अवसंरचना की कमी और दूसरी भाषाई असमानता (National Sample Survey Office [NSSO], 2018)।
भारत सरकार ने इस भाषाई और शैक्षिक अंतराल को पाटने के लिए नीतिगत और व्यावहारिक स्तर पर कई कदम उठाए हैं:
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020): शिक्षा मंत्रालय (2020) द्वारा जारी एनईपी 2020 में बहुभाषावाद (Multilingualism) पर जोर दिया गया है। नीति स्पष्ट करती है कि जहां प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, वहीं माध्यमिक स्तर पर विदेशी और अंग्रेजी भाषा को एक कौशल (Skill) के रूप में आधुनिक तकनीकों के माध्यम से सुदृढ़ किया जाएगा।
समग्र शिक्षा अभियान (Samagra Shiksha): इस योजना के तहत सरकारी स्कूलों में डिजिटल बुनियादी ढांचे (जैसे- आईसीटी लैब्स और स्मार्ट क्लासरूम) का विस्तार किया जा रहा है, ताकि ग्रामीण छात्रों को ऑनलाइन अंग्रेजी शिक्षण संसाधनों तक पहुंच मिल सके (Ministry of Education, 2023)।
दीक्षा पोर्टल (DIKSHA Platforms): सरकार ने डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर फॉर नॉलेज शेयरिंग (DIKSHA) के माध्यम से अंग्रेजी सीखने के लिए इंटरैक्टिव ई-कंटेंट उपलब्ध कराया है, जिससे ग्रामीण छात्र स्वयं-सीखने (Self-learning) की प्रक्रिया से जुड़ रहे हैं।
ब्लेंडेड लर्निंग और डिजिटल टूल्स (Blended Learning): ग्रामीण स्कूलों में डिजिटल शिक्षण (जैसे- मोबाइल ऐप्स, कंप्यूटर-आधारित ऑडियो टूल्स) को बढ़ावा देकर शिक्षकों की कमी को पूरा किया जा सकता है।
शिक्षकों का सघन प्रशिक्षण (Teacher Capacity Building): ब्लॉक और जिला स्तर पर सरकारी अंग्रेजी शिक्षकों के लिए नियमित क्षमता संवर्धन कार्यक्रम (Capacity Building Programs) चलाए जाने चाहिए।
स्कॉलास्टिक एक्टिविटीज (Activity-Based Learning): अंग्रेजी को एक कठिन विषय के रूप में पढ़ाने के बजाय वाद-विवाद, नाटक, और कहानी वाचन जैसी गतिविधियों के माध्यम से सिखाया जाना चाहिए ताकि बच्चों का डर दूर हो।
ग्रामीण भारत में इस गंभीर चुनौती को पहचानते हुए, करियर पाथ फाउंडेशन (Career Path Foundation) ग्रामीण छात्रों, विशेष रूप से बालिकाओं के शैक्षिक सशक्तिकरण के लिए धरातल पर व्यापक कार्य कर रहा है। हमारा दृढ़ विश्वास है कि भाषा किसी भी मेधावी छात्रा के सपनों में बाधा नहीं बननी चाहिए।
बालिकाओं के लिए विशेष अंग्रेजी भाषा कक्षाएं (Foundational English Classes): करियर पाथ फाउंडेशन ग्रामीण क्षेत्रों की बालिकाओं के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए मॉड्यूल के माध्यम से अंग्रेजी के बुनियादी व्याकरण (Grammar) और संचार कौशल (Communication Skills) को मजबूत कर रहा है।
डिजिटल और करियर गाइडेंस (Career Guidance Sync): हम अंग्रेजी शिक्षा को सीधे करियर मार्गदर्शन से जोड़ते हैं, जिससे छात्राएं उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे- तकनीकी पाठ्यक्रम, प्रशासनिक सेवाएं) के लिए स्वयं को तैयार कर सकें।
सशक्तिकरण एवं आत्मविश्वास निर्माण: फाउंडेशन द्वारा आयोजित मेंटरशिप कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीण बालिकाओं के भीतर से अंग्रेजी भाषा के प्रति झिझक को दूर कर उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया जा रहा है, ताकि वे शहरी छात्रों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रतिस्पर्धा कर सकें।
ग्रामीण भारत के छात्रों, विशेषकर बालिकाओं को शिक्षा के माध्यम से सशक्त बनाने के लिए अंग्रेजी भाषा के अंतर को पाटना अनिवार्य है। सरकार की नीतियां सराहनीय हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर व्यापक बदलाव के लिए करियर पाथ फाउंडेशन जैसे नागरिक समाज संगठनों (CSOs) और गैर-सरकारी संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब ग्रामीण भारत की बेटियां भाषाई बाधाओं को तोड़कर आगे बढ़ेंगी, तभी वास्तविक अर्थों में देश का समग्र विकास सुनिश्चित होगा।
Ministry of Education. (2020). National Education Policy 2020. Government of India. https://www.education.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/NEP_Final_English_0.pdf
Ministry of Education. (2023). Samagra Shiksha: An integrated scheme for school education - Annual Report 2022-23. Department of School Education and Literacy, Government of India.
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National Sample Survey Office [NSSO]. (2018). Key Indicators of Household Social Consumption on Education in India (NSS 75th Round). Ministry of Statistics and Programme Implementation, Government of India.
Pratham Education Foundation. (2024). Annual Status of Education Report (ASER) 2023: Beyond Basics. ASER Centre. https://asercentre.org/aser-2023-beyond-basics/
भारत में STEM शिक्षा और करियर में बालिकाओं की भागीदारी: वर्तमान स्थिति, चुनौतियाँ एवं समाधान
दिनांक: 26 जून, 2026
विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था के मुख्य स्तंभ हैं। भारत ने पिछले कुछ दशकों में तकनीकी रूप से अभूतपूर्व प्रगति की है, परंतु इस विकास यात्रा में लैंगिक असमानता (Gender Disparity) एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। विशेषकर ग्रामीण भारत में, जहाँ संसाधनों की कमी और सामाजिक रूढ़िवादिता के कारण बालिकाएं इन तकनीकी क्षेत्रों से दूर रह जाती हैं। यह लेख सरकारी आंकड़ों के आलोक में STEM में बालिकाओं की स्थिति, इसके पीछे के सामाजिक-आर्थिक कारणों, समाज की जिम्मेदारी और सरकार द्वारा चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं का विश्लेषण करता है।
भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (AISHE 2021-22) के अनुसार, उच्च शिक्षा के स्तर पर भारत में कुल STEM नामांकनों में महिलाओं की हिस्सेदारी 43% है। यह वैश्विक स्तर (जो कि लगभग 35% है) से बेहतर दिखाई देती है।
परंतु, इस आंकड़े का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर एक गंभीर "लीकी पाइपलाइन" (Leaky Pipeline) की समस्या सामने आती है:
विषय-वार असमानता: 43% के इस आंकड़े में एक बड़ा हिस्सा प्योर साइंसेज (जैसे- बीएससी, एमएससी) का है। कोर इंजीनियरिंग, रोबोटिक्स और कंप्यूटर विज्ञान जैसे क्षेत्रों में लड़कियों की भागीदारी लड़कों की तुलना में बहुत कम (लगभग 25-30%) है।
रोजगार में भारी अंतर: भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) की अनुसंधान और विकास सांख्यिकी रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल सक्रिय वैज्ञानिक अनुसंधान और विकास (R&D) कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी केवल 18.6% है (PIB, 2024)। इसका सीधा अर्थ है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद भी एक बहुत बड़ा हिस्सा करियर में प्रवेश नहीं कर पाता।
ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बालिकाओं के इस क्षेत्र से दूर रहने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
सामाजिक रूढ़िवादिता (Gender Stereotyping): समाज में आज भी यह धारणा व्याप्त है कि गणित और इंजीनियरिंग "लड़कों के विषय" हैं, जबकि लड़कियों को मानविकी (Humanities) या गृह विज्ञान जैसे विषयों के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है।
रोल मॉडल्स की कमी: ग्रामीण परिवेश में बालिकाओं के सामने महिला वैज्ञानिकों, इंजीनियरों या महिला तकनीकी आंत्रप्रेन्योर्स (Entrepreneurs) के उदाहरण न के बराबर होते हैं।
संसाधनों की कमी और सुरक्षा: ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च और तकनीकी शिक्षा के संस्थान दूर होते हैं। माता-पिता सुरक्षा कारणों से लड़कियों को दूर भेजने से कतराते हैं और वित्तीय संसाधनों की कमी होने पर लड़कों की शिक्षा को प्राथमिकता दी जाती है।
कैरियर गाइडेंस का अभाव: अधिकांश ग्रामीण स्कूलों में उचित करियर काउंसलिंग नहीं होती, जिससे छात्राओं को 10वीं और 12वीं के बाद उपलब्ध अवसरों का ज्ञान नहीं मिल पाता।
इस अंतर को पाटने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:
प्रारंभिक हस्तक्षेप (Early Intervention): कक्षा 6 से 10 के स्तर पर ही बालिकाओं में व्यावहारिक विज्ञान और कोडिंग के प्रति रुचि जगाई जानी चाहिए।
मेंटरशिप प्रोग्राम: शहरों और उद्योगों में कार्यरत सफल महिलाओं को ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों से जोड़ना चाहिए ताकि वे उनका मार्गदर्शन कर सकें।
कौशल और व्यावहारिक प्रशिक्षण: केवल किताबी ज्ञान के बजाय, कंप्यूटर लैब, स्टेम किट्स और व्यावहारिक प्रयोगों (Hands-on training) के माध्यम से आत्मविश्वास का निर्माण करना आवश्यक है।
सरकार के प्रयास तब तक पूरी तरह सफल नहीं हो सकते जब तक कि समाज अपनी सोच में बदलाव न लाए:
जागरूकता अभियान: करियर पाथ फाउंडेशन जैसे संगठनों को ग्रामीण पंचायतों और अभिभावकों के साथ बैठकें कर उन्हें यह समझाना होगा कि बेटियाँ भी तकनीकी क्षेत्रों में नेतृत्व कर सकती हैं।
सुरक्षित वातावरण का निर्माण: स्थानीय स्तर पर सुरक्षित परिवहन और सामुदायिक शिक्षा केंद्रों की स्थापना की जानी चाहिए।
रूढ़िवादिता को तोड़ना: घरेलू स्तर पर खिलौनों और खेल से लेकर शिक्षा के चयन तक, लड़कों और लड़कियों में किया जाने वाला भेदभाव समाप्त होना चाहिए।
भारत सरकार ने इस खाई को पाटने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू की हैं, जिनका लाभ ग्रामीण बालिकाओं तक पहुँचाया जा सकता है:
विज्ञान ज्योति योजना (Vigyan Jyoti Scheme): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा संचालित यह योजना विशेष रूप से कक्षा 9वीं से 12वीं की मेधावी छात्राओं के लिए है, ताकि उन्हें STEM क्षेत्रों (विशेषकर जहां महिलाओं की संख्या कम है) में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इसमें छात्रवृत्ति, आईआईटी/एनआईटी के दौरे और महिला वैज्ञानिकों के साथ संवाद शामिल है (Live Hindustan, 2026)।
सीबीएसई उड़ान योजना (CBSE Udaan Scheme): यह योजना देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों (IITs/NITs) में छात्राओं के नामांकन को बढ़ाने के लिए मुफ्त ऑनलाइन संसाधन, ट्यूटोरियल और मेंटरशिप प्रदान करती है (SBI Life, 2023).
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (BBBP): यह भारत सरकार की एक फ्लैगशिप योजना है, जो प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर बालिकाओं के ड्रॉप-आउट रेट को कम करने और उच्च शिक्षा में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक जागरूकता फैलाती है।
सुकन्या समृद्धि योजना (SSY): यह योजना बालिकाओं की उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करने का एक बेहतरीन माध्यम है, जिससे अभिभावक समय रहते उनकी पढ़ाई के लिए धन संचय कर सकें।
WISE-KIRAN योजना: यह उच्च अनुसंधान (R&D) के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और करियर ब्रेक लेने वाली महिला वैज्ञानिकों को दोबारा मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य करती है।
ग्रामीण भारत की बेटियों में असीमित क्षमताएं हैं। यदि उन्हें सही समय पर उचित मार्गदर्शन, वित्तीय सहायता और सुरक्षित माहौल मिले, तो वे न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे देश के तकनीकी विकास में अग्रणी भूमिका निभा सकती हैं। करियर पाथ फाउंडेशन जैसी संस्थाओं की भूमिका जमीनी स्तर पर इन सरकारी योजनाओं और ग्रामीण समाज के बीच एक सेतु (Bridge) का काम करने में सबसे महत्वपूर्ण है।
Live Hindustan. (2026, June 24). विज्ञान, टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग में लड़कियों को आगे बढ़ाने की सरकारी पहल. https://www.livehindustan.com/videos/government-schemes/science-jyoti-scheme-for-girls-stem-empowerment-201776687785421.html
Ministry of Education, Government of India. (2024). All India Survey on Higher Education (AISHE) 2021-22. Department of Higher Education. https://aishe.gov.in/
Press Information Bureau (PIB). (2024, July). Parliament question: Women in STEM. Ministry of Science and Technology, Government of India. https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2220140
SBI Life. (2023). 10 Government schemes for girls in India. SBI Life Blog. https://www.sbilife.co.in/blogs/finance/government-schemes-for-girls-in-india
सतत विकास लक्ष्य 4 (SDG 4): गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और भारत की वर्तमान स्थिति
सतत विकास लक्ष्य 4 (SDG 4) का मुख्य उद्देश्य है—"समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना और सभी के लिए आजीवन सीखने के अवसरों को बढ़ावा देना।" शिक्षा केवल एक मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह गरीबी उन्मूलन, लैंगिक समानता और आर्थिक विकास जैसे अन्य सभी सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की आधारशिला है।
भारत में नीति आयोग (NITI Aayog) और सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) मिलकर राष्ट्रीय संकेतक ढांचे (National Indicator Framework) के तहत इसकी प्रगति की निगरानी करते हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित SDG 4 के सभी 10 उप-चरों (7 परिणाम-आधारित और 3 कार्यान्वयन के साधन) के तहत भारत सरकार के नीतिगत प्रावधानों और देश की वर्तमान डेटा-समर्थित स्थिति का विस्तृत विश्लेषण नीचे दिया गया है:
उद्देश्य: सभी लड़कियों और लड़कों को मुफ्त, न्यायसंगत और गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मिले, जिससे प्रभावी शिक्षण परिणाम (Learning Outcomes) प्राप्त हो सकें।
सरकारी प्रावधान: Education Act (RTE Act, 2009) 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की कानूनी गारंटी देता है। वर्तमान में इसे कक्षा 12वीं तक विस्तार देने और समग्र स्कूली शिक्षा को एकीकृत करने के लिए 'Samagra Shiksha Abhiyan' चलाया जा रहा है।
भारत की स्थिति (Data): प्रारंभिक शिक्षा (Elementary Education) के लिए भारत की संशोधित शुद्ध नामांकन दर (ANER) 96.5% तक पहुंच चुकी है। देश के 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इस मामले में 100% नामांकन का लक्ष्य हासिल कर लिया है। हालांकि, माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने (Dropout Rate) की दर को कम करना अभी भी एक मुख्य फोकस क्षेत्र है।
उद्देश्य: सभी बच्चों को प्रारंभिक बचपन की देखभाल और गुणवत्तापूर्ण पूर्व-प्राथमिक (Pre-primary) शिक्षा मिले ताकि वे प्राथमिक शिक्षा के लिए तैयार हो सकें।
सरकारी प्रावधान: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत 3 से 6 वर्ष के बच्चों के लिए औपचारिक रूप से 'Balvatika' (Pre-school) की शुरुआत की गई है। इसके अतिरिक्त, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के तहत Saksham Anganwadi and Poshan 2.0 योजना प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) को जमीनी स्तर पर संभालती है।
भारत की स्थिति: UDISE+ डेटा के अनुसार, पूर्व-प्राथमिक स्तर पर औपचारिक सरकारी ढांचा मजबूत हो रहा है, जिससे प्राथमिक विद्यालयों में प्रवेश करने वाले बच्चों की "स्कूल-तैयारी" (School Readiness) में व्यापक सुधार हुआ है।
उद्देश्य: सभी पुरुषों और महिलाओं के लिए सस्ती, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण तकनीकी, व्यावसायिक और उच्च शिक्षा (विश्वविद्यालय स्तर) तक समान पहुंच सुनिश्चित करना।
सरकारी प्रावधान: उच्च शिक्षा में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और नामांकन बढ़ाने के लिए Rashtriya Uchchatar Shiksha Abhiyan (RUSA) और ऑनलाइन/दूरस्थ शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए SWAYAM पोर्टल जैसी योजनाएं सक्रिय हैं।
भारत की स्थिति (Data): उच्च शिक्षा (18-23 वर्ष आयु वर्ग) में भारत के लैंगिक समानता सूचकांक (GPI) ने 1.00 (100% समानता) का स्कोर हासिल कर लिया है, जो दर्शाता है कि कॉलेज और यूनिवर्सिटी स्तर पर महिलाओं की भागीदारी अब पुरुषों के बिल्कुल बराबर आ चुकी है।
उद्देश्य: ऐसे युवाओं और वयस्कों की संख्या में भारी वृद्धि करना, जिनके पास रोजगार, सम्मानजनक काम और उद्यमिता (Entrepreneurship) के लिए प्रासंगिक तकनीकी और व्यावसायिक कौशल हो।
सरकारी प्रावधान: कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय द्वारा Pradhan Mantri Kaushal Vikas Yojana (PMKVY) चलाई जा रही है। साथ ही, स्कूली स्तर पर अकादमिक ज्ञान के साथ व्यावसायिक कौशल को जोड़ने के लिए NEP 2020 के तहत कक्षा 6वीं से ही व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) और इंटर्नशिप को अनिवार्य करने का प्रावधान किया गया है।
भारत की स्थिति: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़ों के अनुसार, औपचारिक या अनौपचारिक रूप से तकनीकी या व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं (15-29 वर्ष आयु वर्ग) के अनुपात में वार्षिक आधार पर लगातार सुधार देखा गया है।
उद्देश्य: शिक्षा के क्षेत्र में हर स्तर पर लिंग भेद को समाप्त करना और विकलांगों, वंचित वर्गों व संवेदनशील स्थितियों में रहने वाले बच्चों के लिए शिक्षा के सभी स्तरों पर समान पहुंच बनाना।
सरकारी प्रावधान: सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों की लड़कियों के लिए Kasturba Gandhi Balika Vidyalaya (KGBV) (आवासीय स्कूल), 'Beti Bachao Beti Padhao' अभियान, और दिव्यांग बच्चों (Children with Special Needs) के लिए बुनियादी ढांचे और विशेष छात्रवृत्ति के प्रावधान लागू हैं।
भारत की स्थिति: प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) में लड़कियों की स्थिति अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणियों में भी सामान्य राष्ट्रीय औसत के समानांतर आ गई है, जो शैक्षिक समावेशन को दर्शाती है।
उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि सभी युवा और वयस्कों (पुरुष व महिला दोनों) का एक बड़ा हिस्सा बुनियादी साक्षरता (पढ़ना-लिखना) और संख्यात्मक ज्ञान (बुनियादी गणित) सीख सके।
सरकारी प्रावधान: शिक्षा मंत्रालय ने 'NIPUN Bharat' (National Initiative for Proficiency in Reading with Understanding and Numeracy) मिशन शुरू किया है, जिसका लक्ष्य ग्रेड 3 तक के हर बच्चे को अनिवार्य रूप से पढ़ने, लिखने और अंकगणित की बुनियादी समझ देना है। इसके साथ ही वयस्कों के लिए 'ULLAS' (Understanding of Lifelong Learning for All in Society) नव भारत साक्षरता कार्यक्रम संचालित है।
भारत की स्थिति: शिक्षा मंत्रालय के परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स (PGI) के अनुसार, बुनियादी शिक्षण परिणामों (Learning Outcomes) की ट्रैकिंग और मूल्यांकन अब जिला स्तर पर कड़ाई से किया जा रहा है।
उद्देश्य: सभी शिक्षार्थियों को वह ज्ञान और कौशल प्रदान करना जिससे सतत विकास, टिकाऊ जीवन शैली, मानव अधिकार, लैंगिक समानता और वैश्विक नागरिकता (Global Citizenship) को बढ़ावा दिया जा सके।
सरकारी प्रावधान: राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) में पर्यावरण शिक्षा, मानवाधिकार, लैंगिक संवेदनशीलता और भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) को एकीकृत किया गया है।
भारत की स्थिति: NCERT द्वारा तैयार की गई नई पाठ्यपुस्तकों में सतत जीवन शैली (Sustainable Lifestyles), जलवायु परिवर्तन और नागरिक कर्तव्यों जैसे विषयों को मुख्यधारा के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।
उद्देश्य: ऐसे स्कूलों का निर्माण और जीर्णोद्धार करना जो बच्चों, दिव्यांगों और लैंगिक संवेदनशीलता के अनुकूल हों तथा सुरक्षित, गैर-हिंसक और प्रभावी शिक्षण वातावरण प्रदान करें।
सरकारी प्रावधान: PM-SHRI (Pradhan Mantri Schools for Rising India) योजना के तहत देश भर में 14,500 से अधिक सरकारी स्कूलों को आधुनिक, पर्यावरण-अनुकूल... और दिव्यांग-अनुकूल "मॉडल स्कूलों" के रूप में अपग्रेड किया जा रहा है। Swachh Vidyalaya Abhiyan के तहत लड़कों और लड़कियों के लिए अलग शौचालय सुनिश्चित किए गए हैं।
भारत की स्थिति (Data): नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 88.65% सरकारी स्कूलों में बिजली और सुरक्षित पेयजल (दोनों सुविधाएं एक साथ) उपलब्ध कराई जा चुकी हैं।
उद्देश्य: विकासशील और सबसे कम विकसित देशों के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा और तकनीकी कार्यक्रमों में नामांकन हेतु वैश्विक स्तर पर छात्रवृत्तियों (Scholarships) की संख्या का विस्तार करना।
सरकारी प्रावधान: भारत न केवल अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए 'Study in India' कार्यक्रम के तहत छात्रवृत्तियां देता है, बल्कि घरेलू स्तर पर अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़े वर्गों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के छात्रों के लिए National Scholarship Portal (NSP) के माध्यम से केंद्रीय क्षेत्र की छात्रवृत्तियां प्रदान करता है। विदेश में उच्च शिक्षा के लिए 'National Overseas Scholarship' योजना भी संचालित है।
भारत की स्थिति: प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से हर साल लाखों छात्रों के बैंक खातों में बिना किसी मध्यस्थ के सीधे वित्तीय सहायता पहुंच रही है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों में उच्च शिक्षा के दौरान ड्रॉपआउट दर को रोकने में मदद मिली है।
उद्देश्य: अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और राष्ट्रीय प्रयासों के माध्यम से शिक्षक प्रशिक्षण (Teacher Training) को बढ़ावा देना और स्कूलों में योग्य व प्रशिक्षित शिक्षकों की आपूर्ति में उल्लेखनीय वृद्धि करना।
सरकारी प्रावधान: शिक्षकों के निरंतर व्यावसायिक विकास के लिए दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम 'NISHTHA' (National Initiative for School Heads' and Teachers' Holistic Advancement) चलाया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, National Council for Teacher Education (NCTE) द्वारा 4-वर्षीय एकीकृत शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम (ITEP) शुरू किया गया है ताकि शिक्षण को एक मुख्य पेशेवर करियर विकल्प बनाया जा सके।
भारत की स्थिति (Data): शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) के तहत प्राथमिक स्तर पर 30 छात्रों पर 1 शिक्षक का मानक तय है। नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक-छात्र अनुपात (PTR) 18 पर पहुंच गया है, जो कि निर्धारित मानक से कहीं अधिक बेहतर स्थिति को दर्शाता है।
नीति आयोग के समग्र SDG इंडिया इंडेक्स के अनुसार, भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी ढांचे (पानी, बिजली, शौचालय), प्राथमिक स्तर पर नामांकन (Enrolment) के मोर्चे पर असाधारण प्रगति की है। हालांकि, व्यापक राष्ट्रीय नीतियों और मजबूत होते बुनियादी ढांचे के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी व्यावहारिक चुनौतियां मौजूद हैं। विशेष रूप से ग्रामीण उत्तर प्रदेश के दूरदराज के इलाकों में लड़कियों के बीच स्कूल छोड़ने (Dropout) की उच्च दर, गुणवत्तापूर्ण करियर मार्गदर्शन की कमी और 'लर्निंग आउटकम्स' (सीखने के परिणामों) में एक बड़ा अंतर (Educational Deficit) दिखाई देता है।
इस ग्रामीण शैक्षिक कमी को दूर करने और SDG 4 के लक्ष्यों को धरातल पर उतारने के लिए 'करियर पाथ फाउंडेशन' (Career Path Foundation) अपने "ग्रामीण शैक्षिक उत्थान" (Educational Upliftment in Villages) के दृष्टिकोण के साथ सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है। फाउंडेशन का यह प्रयास मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण स्तरों पर केंद्रित है:
ग्रामीण बालिकाओं को शैक्षिक सहायता और प्रतिधारण (Retention): माध्यमिक स्तर पर लड़कियों के ड्रॉपआउट रेट को कम करने के लिए करियर पाथ फाउंडेशन ग्रामीण परिवारों के साथ मिलकर काम करता है। फाउंडेशन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी मेधावी लड़की केवल मार्गदर्शन या संसाधनों के अभाव में अपनी पढ़ाई न छोड़े। यह सीधे तौर पर समाज के अंतिम छोर तक शैक्षिक समावेशन को मजबूत करता है।
करियर मार्गदर्शन और डिजिटल साक्षरता: ग्रामीण युवाओं, विशेषकर लड़कियों को 10 दसवीं और 12 बारहवीं के बाद सही करियर विकल्पों की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। करियर पाथ फाउंडेशन गांवों में करियर काउंसलिंग सत्र आयोजित कर उन्हें उच्च शिक्षा, व्यावसायिक पाठ्यक्रमों और आधुनिक अवसरों से जोड़ता है। इसके साथ ही, युवाओं को डिजिटल रूप से साक्षर बनाकर उन्हें रोजगार के लिए प्रासंगिक कौशल की ओर अग्रसर किया जा रहा है।
'निपुण भारत' के समानांतर जमीनी प्रयास: फाउंडेशन गांवों में बच्चों के बीच बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान (Foundational Literacy & Numeracy) को सुधारने के लिए स्थानीय स्तर पर उपचारात्मक कक्षाओं (Remedial Classes) और कम्युनिटी लर्निंग सेंटर्स के माध्यम से सहयोग करता है। यह प्रयास प्राथमिक स्तर पर बच्चों की नींव को मजबूत कर उनकी "स्कूल-तैयारी" (School Readiness) को बेहतर बनाता है।
जहाँ एक ओर राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और सरकारी योजनाएं व्यापक पैमाने पर नीतियां और बुनियादी ढांचा तैयार कर रही हैं, वहीं 'करियर पाथ फाउंडेशन' जैसे संगठन ग्रामीण भारत के अंतिम छोर पर बैठे बच्चों तक उन सुविधाओं और सही मार्गदर्शन को पहुंचाकर व्यावहारिक धरातल पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा (SDG 4) के सपने को साकार कर रहे हैं।
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किसी भी व्यक्ति का विकास केवल उसकी व्यक्तिगत क्षमताओं पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इसमें उसके आस-पास के माहौल, परिवार, समाज और सरकार की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक व्यक्ति को आत्मनिर्भर और सफल बनाने के लिए इन सभी घटकों का एक साथ काम करना आवश्यक है।
व्यक्ति के विकास की प्रक्रिया को मुख्यतः चार भागों में विभाजित किया जा सकता है:
विकास की पहली और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी व्यक्ति स्वयं है।
आदतों और दिनचर्या का महत्व: व्यक्ति का रहन-सहन, खान-पान और उसकी आदतें उसके भविष्य को तय करती हैं।
अध्ययन और संगति: पढ़ाई में मन लगाना और एक अच्छी संगति में रहना व्यक्तिगत विकास के लिए अनिवार्य है।
आत्म-निर्भरता: कई बार विषम परिस्थितियों में जब बाहरी सहयोग नहीं मिलता, तब व्यक्ति को अपनी शिक्षा और प्रगति का खर्च स्वयं उठाना पड़ता है। इसलिए, अपनी सफलता या असफलता के लिए सबसे पहले व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार होता है।
स्वयं के बाद दूसरा सबसे बड़ा योगदान परिवार का होता है।
माता-पिता की भूमिका: इस धरती पर माता-पिता ही सबसे बड़े हितैषी होते हैं। उनकी देखरेख और संस्कार व्यक्ति की नींव तैयार करते हैं।
परिवार का सपोर्ट: माता-पिता के बाद भाई-बहन और रिश्तेदारों का नंबर आता है। चूंकि व्यक्ति की उन्नति से सीधे तौर पर परिवार को लाभ होता है, इसलिए वे हर संभव प्रयास करते हैं कि बच्चों को बेहतर शिक्षा और अवसर मिल सकें। विशेषकर तब, जब व्यक्ति स्वयं रोजगार करके पढ़ने में सक्षम नहीं होता, तब परिवार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
जब पारिवारिक संसाधन कम पड़ जाते हैं, तब समाज की भूमिका सामने आती है।
सामुदायिक सहयोग: कई बार ग्रामीण क्षेत्रों में माता-पिता आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होते। ऐसे में गांव या समाज के लोग चंदा इकट्ठा करके या अन्य तरीकों से बच्चों की पढ़ाई में मदद करते हैं।
गैर-पारिवारिक समर्थन: समाज के वे लोग जो परिवार के सदस्य नहीं हैं, लेकिन फिर भी संकट के समय आगे आकर सहायता करते हैं, वे व्यक्ति के विकास में एक मजबूत आधार बनते हैं।
विकास का चौथा और अंतिम स्तंभ सरकारी नीतियां और योजनाएं हैं।
जागरूकता की आवश्यकता: सरकार द्वारा कई छात्रवृत्तियां (scholarships) और कल्याणकारी योजनाएं चलाई जाती हैं। लेकिन इनका लाभ उठाने के लिए व्यक्ति के पास सही जानकारी और समझ होना आवश्यक है।
सहयोग पर निर्भरता: सरकारी तंत्र से लाभ उठाने के लिए भी व्यक्ति को समाज, रिश्तेदारों और स्वयं के ज्ञान की मदद लेनी पड़ती है।
एक ऐसे तंत्र की आवश्यकता है जहां कोई भी होनहार व्यक्ति संसाधनों या जानकारी के अभाव में पीछे न छूट जाए। इसके लिए निम्नलिखित सुधार किए जा सकते हैं:
अक्सर जो लोग सामाजिक रूप से थोड़े अलग-थलग या दूर रहते हैं, उन्हें सही समय पर मदद नहीं मिल पाती।
समान अवसर: समाज को आगे आकर ऐसे होनहार बच्चों की पहचान करनी चाहिए और उनकी मदद करनी चाहिए जो पढ़ने में अच्छे हैं लेकिन मुख्यधारा से कटे हुए हैं।
मदद का सांस्कृतिक ढांचा: जिस प्रकार शादियों या अन्य उत्सवों में लोग एक-दूसरे की आर्थिक मदद करते हैं, ठीक उसी प्रकार मेधावी और जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए भी समाज में एक स्थाई सहयोग प्रणाली विकसित की जानी चाहिए।
ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में अधिकांश माता-पिता अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे होते हैं, जिसके कारण उन्हें सरकार की लाभकारी योजनाओं का पता नहीं चल पाता।
घर-घर तक सूचना: एक ऐसी व्यवस्था की परिकल्पना की जानी चाहिए जिसके माध्यम से सरकार की हर कल्याणकारी योजना की जानकारी सीधे लोगों के घरों तक पहुंचे।
समाज और सरकार का मिलाजुला तंत्र: आर्थिक सहायता और सूचना के प्रसार के लिए समाज (NGOs, स्थानीय निकाय) और सरकार को मिलकर एक साझा मंच तैयार करना चाहिए ताकि जमीनी स्तर पर पारदर्शिता और गति लाई जा सके।
किसी भी समाज या व्यक्ति के विकास के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा दो सबसे बुनियादी जरूरतें हैं।
सामुदायिक कार्यशालाएं: समाज को अपने स्तर पर स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए नियमित कार्यशालाओं (workshops) का आयोजन करना चाहिए।
मजबूत पकड़: यदि कोई समाज इन दो क्षेत्रों (शिक्षा और स्वास्थ्य) पर अपनी पकड़ मजबूत कर लेता है, तो उस समाज का और उससे जुड़े हर व्यक्ति का तेजी से विकास सुनिश्चित हो जाता है।
सिद्धांतों को धरातल पर उतारने और ग्रामीण क्षेत्रों में सूचना व मार्गदर्शन की कमी को दूर करने के लिए 'करियर पाथ फाउंडेशन' (Career Path Foundation) जैसी संस्थाओं का प्रयास एक अनुकरणीय उदाहरण है। ग्रामीण प्रतिभाओं को सही दिशा देने के लिए फाउंडेशन ने एक अनूठा 'विलेज करियर कोच' मॉडल विकसित किया है।
यह मॉडल क्या है? इस मॉडल के अंतर्गत ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर ही 'करियर कोच' तैयार किए जाते हैं। ये कोच समाज और सरकारी तंत्र के बीच एक पुल (bridge) का काम करते हैं।
सूचनात्मक बाधाओं को दूर करना: चूंकि ग्रामीण इलाकों में माता-पिता अक्सर उच्च शिक्षा के अवसरों या करियर के विभिन्न विकल्पों से अनजान होते हैं, इसलिए ये विलेज करियर कोच सीधे परिवारों और बच्चों से जुड़कर उन्हें सही समय पर सही मार्गदर्शन उपलब्ध कराते हैं।
सरकारी योजनाओं और स्कॉलरशिप से जुड़ाव: ये कोच न सिर्फ करियर काउंसलिंग करते हैं, बल्कि सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न छात्रवृत्तियों, कौशल विकास योजनाओं और प्रवेश परीक्षाओं की जानकारी भी घर-घर तक पहुंचाते हैं।
ग्रामीण लड़कियों के विकास पर विशेष ध्यान: ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों को अक्सर करियर गाइडेंस और आगे बढ़ने के संसाधन नहीं मिल पाते. यह मॉडल विशेष रूप से ग्रामीण बालिकाओं को शिक्षा से जोड़े रखने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में एक मजबूत ढाल की तरह काम करता है.
व्यक्ति का विकास एक सामूहिक प्रयास है। जहां व्यक्ति को स्वयं अनुशासित रहना होगा, वहीं समाज और सरकार को मिलकर एक ऐसा सुलभ पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) बनाना होगा जो आर्थिक और सूचनात्मक बाधाओं को दूर कर सके। 'करियर पाथ फाउंडेशन' का 'विलेज करियर कोच' मॉडल यह साबित करता है कि यदि स्थानीय स्तर पर सही और संगठित प्रयास किए जाएं, तो ग्रामीण क्षेत्रों का कोई भी होनहार बच्चा संसाधनों या जानकारी के अभाव में पीछे नहीं छूटेगा। जब शिक्षा, स्वास्थ्य और सटीक करियर मार्गदर्शन हर गांव के आखिरी घर तक पहुंचेगा, तभी देश के मानव संसाधन का वास्तविक और तीव्र विकास संभव हो सकेगा।
भारत की आत्मा आज भी उसके गाँवों में बसती है, जहाँ देश की लगभग 68.84% आबादी निवास करती है (Census of India, 2011)। भारत वर्तमान में एक अद्वितीय जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) के दौर से गुजर रहा है, जिसमें युवाओं की आबादी सबसे अधिक है। हालांकि, इस लाभांश का वास्तविक लाभ तब तक नहीं उठाया जा सकता जब तक कि ग्रामीण युवाओं को सही कौशल, शिक्षा और सबसे महत्वपूर्ण—सही करियर मार्गदर्शन (Career Guidance) न मिले।
माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर (कक्षा 9वीं से 12वीं) के दौरान, जब छात्र अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण निर्णय ले रहे होते हैं, तब ग्रामीण क्षेत्रों में एक गहरा 'मार्गदर्शन अंतराल' (Guidance Gap) दिखाई देता है। शहरी क्षेत्रों के विपरीत, जहाँ छात्रों के पास करियर परामर्शदाताओं, कोचिंग संस्थानों, इंटरनेट एक्सपोज़र और औद्योगिक कार्यशालाओं तक आसान पहुँच होती है, ग्रामीण छात्र सूचनात्मक अलगाव (Information Isolation) का सामना करते हैं। यह लेख ग्रामीण भारत में करियर मार्गदर्शन की आवश्यकता, इसकी मुख्य चुनौतियों और जमीनी स्तर पर किए जाने वाले आवश्यक हस्तक्षेपों पर प्रकाश डालता है।
शैक्षणिक शोध और विभिन्न सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय छात्रों में करियर को लेकर जागरूकता का स्तर बेहद सीमित है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 93% छात्र केवल सात से आठ पारंपरिक करियर विकल्पों (जैसे—शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, कृषि, रक्षा सेवाएं और पुलिस) से ही परिचित हैं (Scribd CEP, 2025)। यह स्थिति ग्रामीण युवाओं के मामले में और अधिक गंभीर हो जाती है।
जोशी और बख्शी (Joshi & Bakshi, 2024) द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार:
"लगभग 46.7% ग्रामीण और वंचित पृष्ठभूमि के युवाओं के लिए पेशेवर करियर मार्गदर्शन का अभाव उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, लगभग 96% ग्रामीण युवाओं ने माना कि उन्हें अपने भविष्य को संवारने के लिए पेशेवर करियर काउंसलिंग सेवाओं की सख्त जरूरत है।"
ग्रामीण युवाओं के सामने केवल सूचना की ही कमी नहीं है, बल्कि वित्तीय सीमाएं (35.3%) और अंग्रेजी भाषा में कम दक्षता (28.7%) जैसी व्यावहारिक बाधाएं भी उनके आत्मविश्वास को तोड़ती हैं (Joshi & Bakshi, 2024)।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, ओईसीडी (OECD, 2024) की "चैलेंजिंग सोशल इनइक्वालिटी थ्रू करियर गाइडेंस" रिपोर्ट बताती है कि निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि (SES) से आने वाले छात्र अक्सर अपनी योग्यता के बावजूद उच्च शिक्षा और आधुनिक करियर के अवसरों को कम आंकते हैं। वे स्कूल स्तर पर आयोजित होने वाली करियर विकास गतिविधियों (CDA) में शामिल नहीं हो पाते, जिससे उनके और शहरी अमीर छात्रों के बीच की खाई और चौड़ी हो जाती है (OECD, 2024)।
भारत सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) भी इस समस्या को स्वीकार करती है। यही कारण है कि शिक्षा मंत्रालय ने यूनिसेफ (UNICEF) और एनसीईआरटी (NCERT) के सहयोग से हाल ही में एक "करियर गाइडेंस बुक" लॉन्च की है, जिसमें 500 से अधिक विशिष्ट 'करियर कार्ड' शामिल किए गए हैं ताकि छात्रों को स्कूली स्तर पर ही विभिन्न आधुनिक और गैर-पारंपरिक क्षेत्रों का प्रारंभिक एक्सपोज़र दिया जा सके (Ministry of Education, 2024)।
ग्रामीण क्षेत्रों में करियर काउंसलिंग के प्रभावी ढंग से काम न कर पाने के पीछे कई जटिल कारक जिम्मेदार हैं:
सूचनात्मक विषमता (Information Asymmetry): डिजिटल इंडिया के इस दौर में स्मार्टफोन की पहुँच तो बढ़ी है, लेकिन इंटरनेट का उपयोग मुख्य रूप से मनोरंजन के लिए होता है। ग्रामीण छात्र आज भी एग्री-टेक (Agri-Tech), डेटा साइंस, डिजिटल मार्केटिंग, फ्रीलांसिंग और विभिन्न व्यावसायिक एवं तकनीकी छात्रवृत्तियों (Scholarships) के बारे में अनभिज्ञ हैं (Hashtag Counselling, 2025).
पारंपरिक मानसिकता और सामाजिक दबाव: ग्रामीण समाजों में करियर का चयन अक्सर व्यक्तिगत रुचि के बजाय सामाजिक प्रतिष्ठा और तात्कालिक वित्तीय सुरक्षा से प्रेरित होता है। माता-पिता केवल उन्हीं क्षेत्रों पर भरोसा करते हैं जिन्हें उन्होंने अपने आस-पास सफल होते देखा है।
लैंगिक बाधाएँ (Gender Barriers): ग्रामीण लड़कियों के लिए चुनौतियाँ दोगुनी हैं। सुरक्षा और सामाजिक मानदंडों के कारण, लड़कियों को उच्च शिक्षा या नौकरियों के लिए गाँव से बाहर भेजने में अभिभावक संकोच करते हैं (Joshi & Bakshi, 2024)। उनके लिए ऐसे करियर विकल्पों की काउंसलिंग जरूरी है जिन्हें वे स्थानीय स्तर पर या सुरक्षित माहौल में अपना सकें।
संस्थागत कमियाँ: ग्रामीण सरकारी स्कूलों में समर्पित करियर काउंसलर्स (Dedicated Career Counselors) का भारी अभाव है। शिक्षकों पर प्रशासनिक और नियमित शैक्षणिक कार्यों का इतना बोझ होता है कि वे छात्रों को व्यक्तिगत मेंटरशिप नहीं दे पाते (Global Career Counsellor, 2025).
ग्रामीण युवाओं के सपनों और वास्तविक अवसरों के बीच के इसी अंतर को पाटने के लिए, हमारा गैर-सरकारी संगठन (NGO) Career Path Foundation एक सुव्यवस्थित हस्तक्षेप कार्यक्रम का संचालन कर रहा है। हमारा दृढ़ विश्वास है कि किसी भी प्रकार का "एक-आकार-सभी-के-लिए-उपयुक्त" (One-size-fits-all) मॉडल ग्रामीण भारत में काम नहीं कर सकता। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताएं और स्थानीय आवश्यकताएं होती हैं।
इस उद्देश्य के लिए, हमारे एनजीओ ने उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के अंतर्गत 3 ग्राम पंचायतों को अपने प्राथमिक हस्तक्षेप क्षेत्र के रूप में चुना है। कार्यक्रम के प्रभावी कार्यान्वयन और जमीनी वास्तविकताओं को समझने के लिए, हम इन तीनों पंचायतों में एक सघन बेसलाइन सर्वे (Baseline Survey) आयोजित कर रहे हैं।
बेसलाइन सर्वे की पद्धति और मुख्य उद्देश्य:
सेंपल साइज और लक्षित समूह: इस सर्वे में इन 3 पंचायतों के अंतर्गत आने वाले सभी माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों के कक्षा 9वीं से 12वीं तक के छात्रों, उनके अभिभावकों और स्थानीय शिक्षकों को शामिल किया गया है।
मात्रात्मक और गुणात्मक डेटा संग्रह: हम प्रश्नावली (Questionnaires) और फोकस ग्रुप डिस्कशन (FGD) के माध्यम से डेटा एकत्र कर रहे हैं ताकि छात्रों की वर्तमान करियर जागरूकता, उनकी आकांक्षाओं और उनके सामने आने वाली बाधाओं का सटीक मूल्यांकन किया जा सके।
अभिभावकों के दृष्टिकोण का मानचित्रण (Parental Attitude Mapping): इस सर्वे का एक मुख्य हिस्सा माता-पिता की मानसिकता को समझना है—विशेषकर बालिकाओं की उच्च शिक्षा और करियर निरंतरता के प्रति उनके विचारों और भयों को रिकॉर्ड करना।
स्थानीय इकोसिस्टम की पहचान: पंचायतों में उपलब्ध तकनीकी बुनियादी ढांचे (जैसे कॉमन सर्विस सेंटर, इंटरनेट स्पीड) और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध रोजगार/कौशल केंद्रों का मूल्यांकन करना।
इस बेसलाइन सर्वे से प्राप्त होने वाले निष्कर्षों के आधार पर हमारा एनजीओ एक कस्टमाइज्ड, स्थानीय भाषा-आधारित "करियर मार्गदर्शन और मेंटरशिप प्रोग्राम" डिज़ाइन करेगा, जिसे इन पंचायतों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा।
इस हस्तक्षेप का दीर्घकालिक प्रभाव न केवल स्कूल ड्रॉप-आउट दरों (Dropout Rates) को कम करने में दिखेगा, बल्कि यह ग्रामीण युवाओं को अपनी शिक्षा को उद्योग की मांगों के अनुरूप ढालने में मदद करेगा, जिससे अल्प-रोजगार (Underemployment) की समस्या समाप्त होगी (Hashtag Counselling, 2025).
ग्रामीण भारत के युवाओं में प्रतिभा, कड़ी मेहनत और बड़े सपने देखने की क्षमता की कोई कमी नहीं है; कमी है तो बस एक सही दिशा और समय पर मिलने वाली सटीक जानकारी की। जब तक हम ग्रामीण अंचलों के अंतिम छोर पर बैठे छात्र को वैश्विक अर्थव्यवस्था और उभरते हुए करियर अवसरों से नहीं जोड़ेंगे, तब तक देश का समावेशी विकास अधूरा रहेगा। सीतापुर जिले की 3 पंचायतों में हमारे एनजीओ द्वारा शुरू किया गया यह बेसलाइन सर्वे और आगामी हस्तक्षेप इसी दिशा में एक व्यावहारिक और वैज्ञानिक प्रयास है। यह ग्रामीण युवाओं को केवल डिग्रियां हासिल करने की अंधी दौड़ से बाहर निकालकर, उन्हें आत्मनिर्भर और कुशल बनाने का मार्ग प्रशस्त करेगा।
Census of India. (2011). Provisional population totals: Rural-urban distribution. Ministry of Home Affairs, Government of India.
Global Career Counsellor. (2025). Rural schools need career counsellors, too! GCC Blog. https://www.globalcareercounsellor.com/blog/rural-schools-need-career-counsellors-too-2/
Hashtag Counselling. (2025). Career guidance for students in rural areas. Hashtag Counselling Blog. https://hashtagcounseling.in/career-guidance-for-students-in-rural-areas/
Joshi, J., & Bakshi, A. J. (2024). Career-related challenges of rural underprivileged youth in Western India. Indian Journal of Career and Livelihood Planning, 5(1), 37–51.
Ministry of Education. (2024). Navigating life after school: Career guidance book. Department of School Education and Literacy, Government of India. https://dsel.education.gov.in/careers/index.html
OECD. (2024). Challenging social inequality through career guidance. OECD Publishing. https://doi.org/10.1787/619667e2-en
Scribd CEP. (2025). Career guidance for rural students: Community engagement project review. Scribd Documents. https://www.scribd.com/document/913044612/CEP-Review-1
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