सफलता की कहानियाँ Success Stories
"कहते हैं कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर मन में कुछ कर गुजरने का हौसला हो, तो रास्ते अपने आप बन जाते हैं। करियर पाथ फाउंडेशन की सदस्य शिप्रा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है—आँसुओं से उम्मीद तक और बंद कमरों की बंदिशों से खुले आसमान में अपनी पहचान बनाने तक की।"
शिप्रा उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के एक बेहद छोटे और पिछड़े गांव से आती हैं। एक ऐसा परिवार, जहां माता-पिता को मिलाकर कुल नौ सदस्य थे—पांच बहनें और दो छोटे भाई। घर में जमीन का कोई बड़ा सहारा नहीं था और पिता 'शिक्षामित्र' के रूप में मिलने वाले महज 10,000 रुपये के अल्प मानदेय पर पूरे परिवार का पेट पाल रहे थे।
शिप्रा के पिता खुद बी.कॉम शिक्षित थे, इसलिए उन्होंने तंगी के बावजूद अपने बच्चों की पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ा। लेकिन वक्त की मार और सही समय पर नौकरी न मिल पाने के कारण बड़ी बहनों का करियर सही दिशा नहीं पकड़ सका। बड़ी बहनों को संघर्ष करते देख, शिप्रा के पिता के मन में धीरे-धीरे एक गहरी निराशा और संदेह ने जन्म ले लिया—उन्हें लगने लगा कि शायद उनके बच्चे पढ़ाई में ही कमजोर हैं।
"जब अपनों का भरोसा डगमगाने लगे, तो खुद पर विश्वास बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है।"
शिप्रा ने अपनी 12वीं तक की पढ़ाई गांव के ही एक साधारण स्कूल से पूरी की। घरवाले चाहते थे कि वह विज्ञान (Science Side) से पढ़े, क्योंकि समाज में माना जाता है कि इसमें आगे संभावनाएं ज्यादा हैं। शिप्रा का दाखिला एक ऐसे कॉलेज में करा दिया गया, जहां सिर्फ पैसे देकर पास होने का चलन था, जहां शिक्षा के नाम पर कुछ नहीं था।
शिप्रा कहती हैं, "मैंने वहाँ से बी.एससी (B.Sc) तो कर ली, लेकिन मुझे विज्ञान की बुनियादी बातें भी नहीं आती थीं।" इसके बाद, शिप्रा ने एक स्थानीय स्कूल में महज 2,000 से 3,000 रुपये महीने पर 5-6 महीने तक प्राइमरी बच्चों को पढ़ाया। वह दौर ऐसा था जहां न तो आर्थिक संबल था और न ही जीवन में कुछ नया सीखने की उम्मीद।
कहते हैं न कि अंधेरा जितना घना होता है, सवेरा उतना ही नजदीक होता है। शिप्रा की जिंदगी में सबसे बड़ा बदलाव तब आया, जब उन्हें एकलव्य फाउंडेशन के बारे में पता चला। यहीं से उन्हें 'करियर पाथ फाउंडेशन' का साथ मिला।
यहाँ शिप्रा को पता चला कि एक संस्था ऐसी भी है जो CUET PG (Post Graduate Entrance Test) की तैयारी बिल्कुल मुफ्त कराती है। अपनों की हिचकिचाहट और समाज के बंधनों को पीछे छोड़, शिप्रा ने हिम्मत दिखाई और इस कदम को आगे बढ़ाया। यह उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित होने वाला था।
जब शिप्रा का चयन हुआ, तो उन्हें नागपुर जाना था। समाज और परिवार के डर से कदम डगमगा रहे थे, लेकिन शिप्रा के भीतर कुछ कर दिखाने की जिद थी। नागपुर आने के बाद उनकी दुनिया पूरी तरह बदल गई:
मेंटर और कम्युनिटी मेंबर के रूप में पहचान: नागपुर में उन्हें एक मेंटर और कम्युनिटी मेंबर के रूप में काम मिला, जहां वह चीजों को मैनेज करना और जरूरत पड़ने पर बच्चों को जीएस (GS) और हिंदी पढ़ाना सीखने लगीं।
तकनीकी कौशल: जिस लड़की ने कभी कंप्यूटर को ठीक से छुआ नहीं था, उसे संस्था की तरफ से कंप्यूटर मिला। उन्होंने एमएस एक्सेल (MS Excel), एक्सेल शीट का उपयोग और यहाँ तक कि ट्रेन का टिकट ऑनलाइन कैसे बुक करते हैं, जैसी बुनियादी और जरूरी चीजें सीखीं।
आत्मविश्वास की जीत: अकेले सफर करने का डर अब खत्म हो चुका था, अंग्रेजी पर उनकी पकड़ मजबूत हो रही थी और सबसे बड़ी बात—उनका खोया हुआ आत्मविश्वास वापस लौट आया था।
शिप्रा की मेहनत रंग लाई। एकलव्य फाउंडेशन में कई ऐसे लोगों से उनका परिचय हुआ जो पहले से बड़े विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे थे। उनसे प्रेरणा लेकर शिप्रा ने देश के बेहद प्रतिष्ठित अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी (APU) की प्रवेश परीक्षा दी।
आज, शिप्रा का चयन न सिर्फ अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी (APU) में पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए हो चुका है, बल्कि दो-तीन प्रयासों के बाद मिली यह सफलता उनके सपनों को सच करने जैसी है! जुलाई से उनके जीवन का एक नया और सुनहरा अध्याय शुरू होने जा रहा है।
अपनी इस भावुक और प्रेरणादायी यात्रा को समेटते हुए शिप्रा कहती हैं:
"इस कहानी ने मुझे सिखाया है कि कभी भी आराम की जिंदगी के पीछे मत भागो। थोड़ा संघर्ष करो, दुनिया को देखो, लोगों से मिलो और नई चीजों को आजमाने से कभी मत हिचकिचाओ। आज मेरे लिए यह गर्व और फख्र की बात है कि जहाँ मुझे कुछ समझ नहीं आता था, आज मैं अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी (APU) जैसी जगह जा रही हूँ जहाँ मुझे हर दिन कुछ नया सीखने को मिलेगा।"
करियर पाथ फाउंडेशन शिप्रा के इस हौसले को सलाम करता है। शिप्रा की यह कहानी गवाह है कि ग्रामीण भारत की बेटियों को अगर सही मार्गदर्शन और अवसर मिले, तो वे देश के सबसे बड़े मंचों पर अपना परचम लहरा सकती हैं।